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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

एक नयी रिश्तेदारी है.....

काल     सर्व    प्रबल  है,
निर्णय  नितांत   अटल  है।  
भविष्य    की   तैय्यारी है,
एक    नयी   रिश्तेदारी है।

दुःख – सुख   अपने  अपने,

नहीं  कोई   सांझे   सपने।  
समय    की   बलिहारी है,
एक   नयी    रिश्तेदारी है।

मार्ग - द्वार  सब  पृथक - पृथक हैं,

सब  प्रयास  अब  निर - अरथक हैं।  
चांदी की दीवारों में, दफ़्न वफ़ादारी है,
एक       नयी       रिश्तेदारी  है।

जीवन  सागर  में  लहरें  अथाह,

मिटने   को  ही   भरतीं  उछाह, 
प्रतिज्ञा   मैंने   कब  हारी   है?
एक    नयी      रिश्तेदारी  है।

जीवन - धारा  को  मोड़ दिया,

नव पथ पर  मैंने  छोड़ दिया।  
अब   वो   ही   खेवनहारी है,
एक     नयी    रिश्तेदारी है।

अमृतमयी  हुआ जीवन संगीत,

शेष विगत  की न कोई प्रतीत, 
शिव है,  सब सुमंगलकारी  है,
एक    नयी     रिश्तेदारी है।

समय   बड़ा  बलवान  रे भईया!

लौटा  कभी  ना  मुरली बजईया।  
तू  किस भ्रम में पड़ी ऐ नारी है?
एक     नयी      रिश्तेदारी है।

बुधवार, 2 मार्च 2016

ऐसा ना कर


तमगा-ए-बेवफ़ाई  ले , तू ज़िक्र-ए-वफ़ादारियाँ  ना कर।  
कारोबार-ए-उल्फत  में यूँ  काला - बाज़ारियाँ  ना कर।

पर्दादारियाँ   हैं    तेरे    दिल -ओ - ज़ेहन    में   बहोत, 
मेरे    ईमां    से   खेलने    की     नादानियाँ  ना   कर।

सच्चाइयाँ   ही    जीतती     हैँ    आदमी   का    दिल,
फरेब   का   सहारा  ले  कर    बदग़ुमानियाँ  ना  कर।  
  
किसने  बोये  हैं शज़र  और   किसने  बिछायें  हैं काँटे,
इन्हे  पोशीदा  रहने  दे,  अब  और  रुसवाईयाँ ना कर।   

तू    दोस्त  था   कभी   इस  वास्ते   मशविरा  है तुझे,
शबनम    और   आग    की     रुबकारियाँ   ना   कर।

माना  कि  हमने  हारी  हैं लड़ाइयाँ अब तक की सभी,
मौला  सब  की  खैर  करे , तू   फ़ौज़दारियाँ  ना  कर।  

तंगदिल औ' संगदिल,  दिलों  की पैमाईशें करने लगें, 
ख़ुदा   का   ख़ौफ़  खा,   ऐसी   गुस्ताखियाँ  ना  कर। 

भरम न खुल जाये इन सामरी आँखों की शातिर अंदाज़ी का,
रिश्तों  की  खैर  मनाओ,  घड़ियाली  अश्क़बारियाँ  ना  कर।

वो  जो  मेरा  खज़ाना  गर  मेरे  रब ने  मुझे  अता  फ़रमाया , 
तू  क्यूँ  परीशां  है ऐ  दोस्त,  तिलिस्मी पहरेदारियां ना कर।  
     

बुधवार, 4 नवंबर 2015

.... जी चाहता है

आज सब हार जाने को जी चाहता है।
गुल नहीं खार पाने को जी चाहता है।

सब तरफ बिखरा दूँ जो भी है संवरा हुआ,
समंदर  का ज्वार होने को जी चाहता है।

जबसे  संभाले  हैं  पाँव  बहते  जा  रहे हैं,
दरिया नहीं कनार होने को जी चाहता है।

मुझे  ले  चले  और गुमराह  कर  दे  कहीं,
सुलेमानी कालीन उड़ाने को जी चाहता है।

चुप रहने की आदत मैंने भी डाल ली अब,
लफ़्ज़ों  के  पार  रहने  को  जी  चाहता है।

जो सुलगता हो एहसासों का धुआं जिगर में,
सरापा  इक तूफ़ान उठाने को जी चाहता है।

अब सन्नाटे से कर ली हैं मोहब्बत मैंने,
तेरी आवाज़ भूल जाने को जी चाहता है।

तूने रुख मिलाया तो आँखें चौंधियाती रहीं,
मेरा अब पलकें खोलने  को  जी चाहता है।

शुकराना पढता हूँ कि तलब ख़त्म कर दी तूने,
इक सीधी सी ज़िन्दगी जीने को जी चाहता है।
   

रविवार, 15 मार्च 2015

ऐसी कोई शिक़ायत नहीं...


ऐसा   नहीं   कि  हमें   तुमसे  कोई  शिक़ायत  नहीं।  
पर इक इस बात से खफा होना हमारी रवायत नहीं।  

ज़िन्दगी  का  सफ़र  क्या?  चंद  रोज़  में कट जायेगा,
और ऐसा भी नहीं कि हम पर किसी की इनायत नहीं।  

हर  सिम्त  खा कर ठोकरें भी,  देंगे  ना  बददुआ कभी,
बेगैरत  भी  जी  लेंगे,  तुमसे  ऐसी कोई अदावत नहीं।  

झुक कर चलने वाला ही उठा कर सीने से लगाया जाता है,
तन   कर   चलते   रहने   में   कहीं   कोई   महारत   नहीं।  

रंगीन   ख्वाबों    का   काँच  तो  चटक    कर   टूटता  ही  है,
और इस काँच के टुकड़े से घायल होना कोई नज़ाकत नहीं।  

औरों  को  पिछाड़  कर  आगे  निकलना एक बात है,
किसी  का  सीना  चाक कर दो,  ये तो शराफ़त नहीं।  

जब  उरूज़  पर हो तो भूल जाओ, मुफलिसी में याद करो,
इसे  कोई  और  नाम  देना,  यक़ीनन  ये  मोहब्बत नहीं।  

अपने  ज़ख्मों को नुमाइश का सामां मत बनाओ ऐ शायर,
हर  लफ्ज़  जो  करे  बयां दर्द-ए-दिल  तो ये सदाकत नहीं।  


शनिवार, 7 मार्च 2015

मंथन


सागर मंथन का क्या? वह तो बस कोरा छल है।  

जब मन में तेरे भेद भरा था, फिर न्याय का क्यूँ उल्लेख किया?
अपने  मन  के  सम्बल  हेतु क्यों  मेरा  झूठा  अभिषेक  किया? 
अपना अधिकार ही  माँगा था,  इसमें क्या कुछ अतिरेक किया?
 हमने तुम पर विश्वास किया, और तुमने आरोप प्रत्येक दिया।  
ऐसे में भी तत्पर हैं हम, तुमसे अपना सम्बन्ध अटल है।  
सागर मंथन का क्या? वह तो बस कोरा छल है।

जिसको    चाहा    तुमने   प्रसाद    दिया,
मधु नहीं,  अमृत - कण का स्वाद  दिया,
विष ढाला प्याले में और आर्तनाद  दिया. 
हमको   जीवन  भर  का  अवसाद  दिया,
कितना   सुन्दर गढ़ा  गया इस नाट्य मंच का पटल है।  
सागर मंथन का क्या? वह तो बस कोरा छल है।

मन  को मथना,  सोच - विचार  सब धोखा है,
जो नियत किया तुमने, उसको  कब रोका है? 
मिथ्या   वचनों   का    यह    खेल  अनोखा है,
दोष विधाता को दे दो, क्या अद्धभुत मौका है।  
खुद को पावन प्रस्तुत करना कितना सहज सरल है।  
सागर मंथन का क्या? वह तो बस कोरा छल है।

जब देव - अदेव का भेद किया  तब  चिंतन को क्या शेष बचा?
गुण-अवगुण जब निश्चित हैं, तब मंथन से क्या सन्देश रचा?
जब  पहले  से  बलिहारी  हो,  फिर क्यों भरमाते हो वेश सजा?
अमृत-घट उनको ही दे दो , मेरे पलड़े में तुम दो विद्वेश बढ़ा।  
भाव मथे जिस ह्रदय में तुमने वह पत्थर है, मंदराचल है।  
सागर मंथन का क्या? वह तो बस कोरा छल है।

शुक्रवार, 6 मार्च 2015

इस बार होली में.......


पुराने   उन   सारे  वादों  को,
खट्टी - मीठी सबरी यादों को,
उजले दिन, सुहानी रातों को,
कही-अनकही सारी बातों को,
इस  बार  होली  में  सब  कर  दिया  दहन मैंने।    

जीवन में  जो भी अब अभिव्यक्त  हो,
शुष्क   हो,  आर्द्र, शीतल  या तप्त  हो,
भग्न हो, बिखर जाये कि विन्यस्त हो,
यह मेरा प्रारब्ध , तुम इससे मुक्त हो।  
इस   बार   होली   को  एकला   किया  वहन मैंने।  

जीवन    के   विराट  से  कुछ  कण बीन लाने हैं,
ईश्वर   भी   राह   रोके,  वह  क्षण छीन लाने हैं,
साहस, संकल्प, संयम, जीवन के तीन माने हैं, 
काल की गति वही जो हम कर्म में लीन ठाने हैं। 
इस  बार  होली में  भाग्य  का  कर  दिया ज्वलन मैंने।  

विधान  स्वयं  गढ़ेंगे,  त्रिकाल हम पढ़ेंगे,
चौसर  का  खेल  बंद, अंधता नहीं सहेंगे,
तेग  पर   धार  देंगे,  भविष्य नया रचेंगे,
    उऋण होने हेतु ही जीवन पथ पर चलेंगे।    
इस  बार  होली  पर  यह  व्रत  किया  वरण  मैंने।  

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

शुभकामना


नव  प्रवाह  आया,  लाया नयी  धारा।  
नभ  में  चमका  है  सुदूर  एक  तारा।  
न विजित हुआ कभी, तम सदा हारा।  
सरल   यह   सत्य  जाने  जग  सारा।  

नव प्रभात देगी  नया एक उजियारा। 
नव क्रांति  तोड़ेगी  भ्रान्ति  की कारा।  
द्युति को भी कभी किसी ने बिसारा? 
स्वर्णांकन ने सदा  दीप्ति को उभारा। 

नव  प्रपात  फूटेंगे अनेकों जल धारा। 
शीतल   होगा   हर   जलता  अंगारा।  
तपस्या  का  फल  मीठा और न्यारा। 
अनुग्रहीत   हो  ही  सबने  स्वीकारा।  

नव प्रयास   देंगे  अक्षुण्ड़ रस धारा।   
यह व्रत  एकमेव  मस्तक पर वारा। 
दिशाओं  ने पुनः  एक बार  पुकारा। 
 तत्पर  पथिक  ने पथ  को निहारा।  

नव पग  उठाये  जो, वह कभी ना हारा।
तिनके तक ने  दिया डूबते को  सहारा। 
संकल्प की  शक्ति ने साहस विस्तारा।  
शुभ  हो जीवन   आपका  और हमारा। 

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

पथ और पथिक


मै पथिक नहीं मै तो पथ हूँ।  

जीवन   की  राहों  पर  राही  तो  मिलते   जाते हैं।  
कुछ  खुद से  ही आते हैं,  कुछ को हम ले आते हैं।  
कुछ  पल हेतु   कोई, कुछ  सुदूर  साथ निभाते हैं।  
हल्की हो या कि गहरी सब छाप छोड़ कर जाते हैं।  

पर तुम यह सोचो पंथी किसके संग शपथ लूँ?
मै पथिक नहीं मै तो पथ हूँ।  

अलि  का  झुण्ड कली  पर तो  सदा से रहता आया है।  
अपने   शब्दों के  गुंजन  से  उसका  मन  भरमाया है।  
सींचा जिस जल की धारा ने उसने ही प्रेम निभाया है। 
निहित धरा में सच्चा प्रेमी कलि को पुष्प बनाया है।  

यौवनाकर्षण भ्रमरों का, पर अपनी मिट्टी से अटल तू।  
मै पथिक नहीं मै तो पथ हूँ।  

उड़ते  पंछी   ठाँव  देख  कर  सुस्ताने  रुक  जाते हैं।  
देवी का  गाँव  देख  कर  दस्यु   भी  शीश  नवाते हैं।  
अमराई  की   छाँव  देख कर  प्यासे  ताप मिटाते हैं। 
मेहँदी   भरे    पाँव  देख  कर   लोभ   सवाँरे जाते हैं।
  
पुण्य फलित कब होता हैं इसका कुछ निर्धारण कर तू।  
मै पथिक नहीं मै तो पथ हूँ।  

पथ  पर  सुमन - बेल  बिखरेगी,  कंटक  भी  कुछ  आएंगे।  
अंधड़   और  वर्षा  जब  होगी  कुछ   धूल - पंक  छा जायेंगे।  
पथ  शीतल  करते  विटप  भी  देखो  सूरज में  कुम्हलायेंगे।  
पुलिन हो पथ पर या कि रेत हो, तेरे  पग का भार  उठायेंगे।    

पथ  पर तू  विश्वास  जमा,  मत  पथिकों  को  वर  तू। 
मै पथिक नहीं मै तो पथ हूँ।  

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

हरि इच्छा


मैं  प्रस्तुत  हूँ  जैसी  भी  हो  अब  परीक्षा। 
जीवन - रण में  तत्पर  हूँ  ले  पूर्ण  दीक्षा। 
जय वरण करूंगा अस्वीकार सारी भिक्षा।  
विश्वास अखंड है मेरा धारूँगा हरि इच्छा।  

ऐसा भी क्या ? जो वांछित  हो  कर  भी  प्राप्य नहीं?
जीवन में संगीत ना  हो, कदापि मुझे स्वीकार्य नहीं।   
मेरी वाणी में ओज है यह रोदन का कोई काव्य नहीं।  
मेरे गीतों को हर ले,  यह किंचित भी सम्भाव्य नहीं।  

सत्य  पराजित  होगा ?   क्या  यह  ऐसा  युग  आया हैं ?
शशि को देख निशा में,  दिनकर को किसने बिसराया है ?
मार्तण्ड  की   किरणों  से   खद्योत  कभी  लड़  पाया है ?
रश्मिरथी भानु के सम्मुख, छिन्न तारों तक की माया है।  

 मैं नहीं प्रस्तर सा,  मुझमे  धड़कता है ह्रदय।  
चंद आघात न कर सकते कुछ मेरे भाव क्षय।  
मेरे खड्ग पर धार नयी, चिर नूतन मेरा वय।  
अश्वमेध का यज्ञ है ये,  नहीं रुकेगा मेरा हय। 

यह    घोष   है  संग्राम   का,  बज   गयी   रणभेरी।  
यह  स्वयंवर  है  यदि तो  विजय निश्चित है मेरी। 
एक लकीर प्रभा की मिटा देती है कालरात्रि घनेरी।  
मन  में  विश्वास अटल  है जो  फिर हो कैसी देरी ?

व्रत मान लिया, रण ठान लिया, यह जीवन  मैंने बलिदान किया।    
मछली  की आँख को देखा  और  परछाईं से कुछ  अनुमान लिया।    
अपने संकल्पों को परखा मैंने,  फिर  देव  तुम्हारा  ध्यान  किया।  
प्रत्यंचा  पर  डाला  शर  को  और  लक्ष्य का अपने संधान  किया।  

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

प्रेम

प्रेम धार है,
प्रेम सार है,
ओमकार है,
करतार है। 

प्रेम है पूजा,
कोई न दूजा,
सिवा प्रिय के,
कोई न सूझा। 

प्रेम सजल है,
प्रेम अ-जल है,
पति के हेतु,
यह निर्जल है।  

प्रेम अयास है,
प्रेम रास है।  
निशि-दिन 
एक सुवास है।  

प्रेम हार है?
प्रेम खार है?
रुग्ण पुकार
व चीत्कार है?

प्रेम शमित है,
और भ्रमित है,
जिसने किया न 
अर्पित चित्त है।  

प्रेम कँवल है,
प्रेम धवल है,
यह निर्मल है,
अति उज्जवल है। 

प्रेम अनल है,
या शीतल है?
पूछो उसको जो 
प्रेम विह्वल है।  

प्रेम भक्ति है,
प्रेम शक्ति है।  
कल भी था ये,
और सम्प्रति है।  

प्रेम सुस्मित है, 
तुम्हे विदित है. 
मेरा तुमको 
प्रेम नमित है।   

मुझको तू कुछ जान सखे!

किस भाँति है मेरा प्रेम तुझे यह बात तू किंचित जान सखे ! 

प्रेम  -  विटप  पर  आकांक्षा     के  पुष्प  फहरते।  
हर   पंखड़ी  में   अनगित   नेह   भाव   मचलते।    
नील,  पीत, हरित, रक्ताभ   सकल  रंग उभरते।  
नाना  भावों   को  स्पंदित और  मुखरित  करते।
बलिहारी  सारी   सुषमा  ज्योँ  कर  रही   प्रेम  प्रदान सखे !
इस  भाँति है  मेरा प्रेम  तुझे  यह बात अटल तू जान सखे !  

अम्बर  में  श्यामल  वारिद ले मृदुल  वारि कण फिरता है।  
चहुँ  दिसि  प्रेम की बरखा  करने  पागल हो - हो घिरता है। 
कितनों  के  मन के  भावों  के  अनुकूल रूप धर  तिरता है।  
हर प्रेमी के नयनों को उसके प्रियतम का चेहरा  दिखता है।  
कर सकता यह कोई शब्द व्यक्त? इस बात को तू  पहचान सखे !
इस   भाँति   है   मेरा  प्रेम  तुझे  यह  बात  अटल  तू  जान  सखे !

नदियों की  धारा  का  संगम  कुछ  तो  बात  बताता  है।  
अर्पण, न्योछावर  के  बाद  बचा  कहाँ  कुछ  रह पाता है?
एक  धार  हो कर  जब  संगम, नद  का  प्रवाह बढ़ाता है। 
तट पर रह कर कौन भला तब पुण्य अपना बिसराता है?
मध्य  धार  रह  कर  देने पर ही बढ़ता अर्घ्य का मान सखे !
इस  भाँति  है  मेरा  प्रेम  तुझे यह बात अटल तू जान सखे !

पयोधि  की  जलराशि को  जब  शशि अपना  भाल दिखाता है। 
लहरों    का    उत्साह     स्वयं   ही   कई    गुना   बढ़ जाता है।  
निर्जन पड़े किनारों को आ  सागर   सजीव,  नम कर जाता है। 
नीर तीर से वापस जाता,  तब क्या चन्द्र कुछ रोष जताता  है?
आना, जाना, उठना,  गिरना सब गति जग की है रख ध्यान सखे !
इस   भाँति   है   मेरा  प्रेम   तुझे  यह  बात  अटल  तू  जान  सखे !

ह्रदय   ह्रदय  से  बात  कर    रहा  संदेसा  यह    पहचान सखे !
यूँ ही ना मिल गये हम-तुम, यह फलित योग का प्रमाण सखे !
गात  दो  और  प्राण  एक,  इस  भाव  का  धर  कुछ  भान सखे !
परिपूर्ण प्रेम से  पात्र  हमारा,  अवकाश  का  क्या  स्थान  सखे !
तुझको  अर्पण  हैं  भाव  समस्त  यह  बात  पूर्णतः  जान सखे !
इस  भाँति  है  मेरा  प्रेम   तुझे  यह  बात  अटल तू  जान  सखे !

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

सच्चा प्रीतम


मिथ्या  है वह  भाव  जिसे  खुल  कर समझाना पड़ता हो।  
भावहीन  रह जाना अच्छा जो झूठे ही इठलाना पड़ता हो।  
कैसा  है  यह प्रेम सखे !  जो शब्दों में बतलाना पड़ता हो ?
कैसा  वह  बंधन  जो  भौतिकता  में दिखलाना पड़ता हो?

देखो प्रेम-दीप की दीप्ति प्रिये, वह भीतर-भीतर जलता है। 
यह ज्वाला  देती जब ऊष्मा, तब  ही  तो कुन्दन तपता है।  
यह  रश्मि  दिखे ना जो, मतलब  आँखों पर पट्टी बाँधी है।  
ऐसी  ज्वाला  का क्या? जिसको जीते हल्की सी आँधी है।

ऐसे  निर्झर  की धार  प्रेम, जो फूटे स्वतः स्फूर्त अनायास।
व्यभिचार कहूँगा उसको, जो सोच समझ कर हो सप्रयास। 
हृदयांचल    से  बहती   सरिता,   प्रीति  की  यह  रीति है।    
गुणा,  भाग  और  जोड़,  घटाना  संबंधों की  राजनीती है।

मन   में   झांको,  मत लो आलम्बन - आडम्बर की आड़।  
चरितार्थ   हुयी  कहावत  देखो  कि  -  'खेत खा रही बाड़'।     
क्या यही छुपा था अंदर में? निष्क्रिय, शांत, शिथिल, सुप्त?
वासनाओं  का लावा फूटा,  हो कर उद्वेलित और उन्मुक्त?

उलाहना सरल है देना, किससे क्या हो सका प्रेम - डगर में?
कठिन राह है, दुरूह मार्ग है, संकरी गलियां प्रेम - नगर में। 
कालजन्य   प्रश्नों  की  दुविधा , किसको  मन  में वर लो ?
सच्चा प्रीतम खोजो? या अपने प्रियतम को सच्चा कर लो।  

शुक्रवार, 30 मई 2014

..... छोड़ दो

सुबह शाम के  अलाप छोड़ दो,
गुरियों  पर  वो   जाप छोड़ दो,
चिंता  भरे  हुये   इस  मन  से,
जीवन  के  संताप   छोड़   दो।

 
रहो या कि तुम  साथ  छोड़ दो,
हज़ारों क्या तुम लाख छोड़ दो,
मानूंगा  तुमको  मैं साथी  तब,
मुठ्ठी  भर  जब  खाक़  छोड़ दो।


सीधी  बात   कहो  'अर्थात' छोड़ दो,
सारे    उनके     निहितार्थ  छोड़ दो,
जो   मन   में   प्रीत   बसायी   तूने,
फिर समझो भाव, भावार्थ छोड़ दो।


जो  पीड़ा   दे  वह  प्यार  छोड़ दो,
अभिलाषा  वाले  व्यापार छोड़ दो,
उस  ओर   धरा  है,   हरियाली  है,
और मुझको तुम  मँझधार छोड़ दो

अंधड़  से  नौका  के   विलाप  छोड़ दो,
राग-द्धेष  की ऐनक  वाले पाप छोड़ दो,
आने  वाली  सदियों  के पल रहें मुखर,
पद्चिन्हों  की  तुम  वह छाप छोड़ दो।    
  
कहते  हो  तुम  प्रीत  छोड़ दो,
बढ़   जाओ  मनमीत छोड़ दो,
जीवन    मेरा   प्रेम - धुनी   है,
मत बोलो  कि संगीत छोड़ दो। 


अधरों  से  अधरों  का  आधार  छोड़ दो,
फिर नयनों में असुवन की धार छोड़ दो,
मत फहराओ स्वागत की ध्वज पताका,
बस  तुम  खुले  ह्रदय  के  द्धार  छोड़ दो। 


संदेसा चातक को कि आशा छोड़ दो,
पथरायी  अंखियों  की भाषा छोड़ दो,
छोर काल  के  पल  में  नप  जाते  हैं,
रे उत्साही,  सबरी  निराशा  छोड़ दो।    

  

मंगलवार, 25 मार्च 2014

आलिंगन

यह  कैसा  पूजन, आराधन  जो  छू  न  सके  तनिक  भी मन को?
वह अर्चन, वंदन क्या, जो जिह्वा पर सीमित कर दे सुमिरन को?
उस  तप  की  आंच  का  क्या,  कंचन  न  करे  जो  आचरण  को?
व्यर्थ   वह  दर्शन -  नमन,  जो  झंकृत  न  कर  पाये  चेतन  को। 

बहुत    हुआ,  अब    बंद   करो   इस   कपट   ढोंग   प्रदर्शन  को। 
मिथ्या    चीत्कार   को,     प्रस्तर   पर   मस्तक   के  घर्षण  को। 
मूल्यहीन,    बलहीन     किया   अन्तर्मन    के    अभ्यर्थन   को। 
अब    कौन    करे    उद्घोष,    करे    आमंत्रित   परिवर्तन   को?

प्रस्फुरित   करेगी   आकुल   पुकार,   नेपथ्य  के   उद्बोधन  को,
जिसकी  भी  है    सत्य   शपथ,   वह  प्रस्तुत  सागर-मंथन  को। 
विष  का  क्या,   हर   सकेगा  वह  किसी  के  आत्म-संवेदन को?
अमृत     भी     क्या    देगा,    वैरागी    मन    के   चिंतन   को?

प्रस्तुत    हो    वह,    जो    है   तैयार     समग्र     समर्पण    को,
जीवन - प्रत्यंचा      पर     साधे     श्वासों     के    स्पंदन    को। 
उत्कंठित   हो   यदि  नव - ईश्वर  के   स्वागत-अभिनन्दन  को,
फिर    बढ़    कर   स्वीकार  करो    अस्तित्व   के  आलिंगन  को। 

सोमवार, 24 मार्च 2014

क्रांति

नव-युग   में  विचारधारा  को  नित  संशोधन  चाहिये,
प्रवाह  के  संग  बहने   का  मुक्त  अनुमोदन  चाहिये। 
इसी  भीड़  में  मिल  जायेंगे  नाम  तुम्हे  मतवालों के,
विश्वास  कर  सके तुम पर वो ऐसा सम्बोधन चाहिये। 
 
भरा   हुआ   है   भावों  से,  इसे   ना  प्रलोभन  चाहिये,
निर्मल  मन  वालों  को  भी क्या  कोई शोधन चाहिये?
अन्तस्तल  के  अंधेरों  में  धवल  कांति  बिखरा  देंगे,
सूत्रधार  बनेंगे  परिवर्तन के,  स्पष्ट प्रयोजन चाहिये। 

अतुलित  इन  क्षमताओं  का  जग  को  दोहन चाहिये,
निष्ठाओं  की  बलिवेदी  पर  तनिक न  रोदन चाहिये।   
फूंको   मंतर  ऐसा  यौवन   के  इस  उत्प्रेरक  बल  पर,
मुग्ध  हो,   करे  अनुसरण;  दिव्य सम्बोधन  चाहिये।

अन्तर्मन   हो   आंदोलित   ऐसा   उद्बोधन   चाहिये,
प्रज्ञा  के  तारों   को  छू  दे,   गहन   प्रबोधन   चाहिए। 
बिखरे   हुये   इन  फूलों  से  एक  पुष्पाहार  बनाना  है,
फिर  से  गौतम  को  लाना  है  हमें  शुद्धोधन  चाहिये। 

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

एक तारा

तेज़  रफ़्तार ज़िन्दगी  ऐसे  हौले  से  मोड़ती है।  
कभी सरापा लबरेज़, कभी खूं तक निचोड़ती है। 

हयात   उतरती   है   किसी  के   सीने  में   जब,
रगों  में  खून    नहीं एक  उम्मीद    दौड़ती   है। 

गेसुओं   को   अपने   चेहरे   पर   ले   आती  है,
शर्मा कर  जब  वो  खुद  अपनी  लट  ओढ़ती है।

तुम्हारी   यादें   क्या - क्या   कर   गुजरती   हैं,
दिल  थामती  हैं  तो  कभी  सांसों  से जोड़ती हैं।

वो   कहते  हैं  कि  ये  सब  शायराना  शगल  हैं,
सच  कहा,  बेख़ुदी 
हकीक़त में कब   छोड़ती है।
मैं  सजा  लेता  हूँ  गुलदस्ते  तुम्हारी  यादों  के,
फुरकत   की   आबोहवा   मेरा  दम  तोड़ती  है। 

हाशिया,   मेरे   आराम  की   बेहतर  जगह   है,
फलक   की  गहमागहमी   मुझे   सिकोड़ती है। 

तुमसे   कोई   शिकवा    नहीं   है         मुझको,
तुम्हे  छू   के  आयी  हवा  बहोत  झिंझोड़ती है।

मेरी मुठ्ठी में है टूटा हुआ तेरी पलक का एक बाल,
मुन्तज़र हूँ कि कब कहकशां कोई तारा तोड़ती है।  

बुधवार, 15 जनवरी 2014

यह देखा मैंने...


अवसान   हुआ  जब  आशाओं का, तो   रंग  तुम्हारे देखे। 
छल, छद्म, मिथ्या, प्रवंचना,  जीवन के अंग तुम्हारे देखे।

झूठी   थाप   बजाने  वाले   वक्रित  मिरदंग  तुम्हारे देखे।  
कंग  खंग  गंग  घंग  चंग  छंग,  सब   ढंग   तुम्हारे देखे।

मुख    में  राम    बगल   में  छुरी,   सत्संग   तुम्हारे देखे।
खंडित    जीवन   वाद्य   और   नर्तन   नंग  तुम्हारे देखे।

स्वप्नों  की  तो  बात  ही  छोड़ो  जो मैंने संग तुम्हारे देखे।
विस्मित  हो  सत्य  को जाना, विचार बदरंग तुम्हारे देखे।

न्यून   हुआ   नव - परिभाषित,  दायरे   तंग  तुम्हारे देखे।
संवेदित  संकेत  किये जब, प्रति-संवेदन भंग तुम्हारे देखे।

नव आस  कहाँ से जग पाती जो  मंडराते भृंग तुम्हारे देखे।
मुझको खो कर सब पाना है, अभिलाषा - श्रृंग तुम्हारे देखे।
 

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

ऐसा नहीं

कोई  मुझको  चाह  ले ऐसा नहीं।
मेरे  ग़म  की  थाह  ले ऐसा नहीं।
 
मुश्किलात  हासिल हैं  हर वक़्त,
दिल  थोड़ा  कराह  ले ऐसा नहीं।

मैं उसको चाहता हूँ दिलोजान से,
मुझको भी वो चाह ले ऐसा नहीं।

इंकलाब के ख़यालात मुझमें भी हैं,
हुक़ूमत मुझसे सलाह ले ऐसा नहीं।

सिधाई  अभी  भी  बची  है काफ़ी,
सिर्फ़  टेड़ी  ही  राह  ले ऐसा नहीं।

मेरी आँखों में गहरायी नहीं शायद,
वो मेरे दिल की  थाह ले ऐसा नहीं।

छोड़  दिया  अब  आदमी के भरोसे,
ख़ुदा हिसाब-ए-ग़ुनाह ले ऐसा नहीं।

दिक्कतें   मेरे  साथ   भी   हैं   कई,
सब  मुझसे   निबाह  ले ऐसा नहीं।

शामियाने ज़िन्दगी के उखड़ गए,
अब  कोई   पनाह  ले  ऐसा  नहीं।

मैं  भी  कुछ अपनी पसंद रखता हूँ,
जो चाहे मिला निग़ाह ले ऐसा नहीं।
 

रविवार, 10 नवंबर 2013

वन्दिता

क्षीर  नीर  से  ले   कर  ज्यों  कोई   हंस  हो  पीता,
ऐसे सम्बल ले कर तुमसे मैं जीवन अपना जीता।

क्यूँ न कहूँ सागरिका तुमको, मिलें जहाँ गुण-सरिता,

पतझर  में  सावन  ला  दो,  हे  स्नेह-स्वरूपा वनिता।

जीवन के क्षण युग से लगे, ऐसा  भी एक काल है बीता,

वह  पल  भी  है  मैंने  भोगा  जब स्वयं ही से  मैं भीता।

बरसाया अनुराग बहुत सा, बन कर मेरी अनुप्रीता,

मैं  ही  संचय  कर ना पाया, हृदयकोश  चिर  रीता।

रहा नहीं मधुमास ,हाय! विलग हुयी मुझसे मेरी मधुमीता,

अहो!  क्या  कर  सके  राम भी,चली  गयीं  थी जब  सीता ?

तिस पर भी  उर से  लगा रखे मस्तक पर बन रज -शोभिता,
प्रेम-गुच्छ  का  अर्पण  फीका, प्रिये! तुम  हो  मेरी  वन्दिता।


गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

तेरी रज़ा

जो मैंने सोचे  भी ना  थे  कभी  उन गुनाहों की सज़ा दी उसने।
मेरी आँखों को जलाते ऐसे फुरकत के शोलों को हवा दी उसने।

अमानत  के  मानिन्द दी थी जिन्हें अपने नसीबों की पोटली,
मेरे    पापों      गठरी     समझ,     गंगा  में   बहा  दी   उसने।

जिन पन्नों पर लिखी थी इबारत कुछ अनकही दास्तानों की,
वो   किताबें   मेरी    नज़रों   से   छुपा  कर  जला  दी  उसने।

मै   मानता   था  रहनुमाई   को  हाथ  उसका   आएगा  ज़रूर,
तूफान में डोले कोई पत्ता,  मेरी याद कुछ यूँ बिसरा दी उसने।

कलम  पे  चोट  होती  और  काफ़िये  पे  रोक  लेती जिंदगानी,
एक  सन्नाटा  सा  था  पसरा,  और  शायरी  फ़ना  थी  उसमे।

और मुश्किल ये  भी कि आंसू कागज़ पे अलफ़ाज़ छोड़ते नहीं,
बदल   गयी   है  अब   मेरी  रचना, सियाही  कज़ा  की  उसने। 

वक़्त  बदलता  है,  रवायतें,    चालोचलन,  दस्तूर  बदलते  हैं,
अपने   हाथों   से   खैंची   लकीरों   की  ये   वजह  दी   उसने।

इस  ढलान  पर कोई  कदम से कदम  मिला कर चलेगा  साथ,
ये  सोच  कर जो हमराह था मेरा, अपनी रफ़्तार बढ़ा दी उसने। 

मैं फिर भी पकड़ लूँगा उसे, ये सच उसका खुदा भी जानता है,
रंज बस इतना है कि तेरी भी रज़ा थी जब ये खता की उसने।