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सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

निर्णयवान

निर्णय एक जटिल एवं विषम प्रक्रिया है? संभवतः यह एक सरल एवं सम प्रक्रिया है? निश्चय ही निर्णय का कारक विभिन्न व्यक्तियों हेतु भिन्न-भिन्न अनुभव ले कर आयेगा तथा व्यक्ति इन्ही कारकों में स्वयं के लिए संतोष की खोज कर आत्मतुष्ट होने की घोषणा करेगा। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी हैं कि यह जाना जाये कि निर्णय के इस तट पर व्यक्ति स्वतः के संवेग से पहुंचा अथवा प्रयास की लहरों से? इसी तथ्य का संज्ञान व्यक्ति के लिए उस निर्णय की प्रक्रिया के स्वभाव एवं उसकी आवश्यकता की सार्थकता की पुष्टि करेगा।
 
यह जान लेना आवश्यक है कि महत्त्व के बिंदु क्या हैं? क्या क्षणिक वैचारिक मतभेद किसी विषय के प्रति आपकी सैद्धांतिक सहमति को प्रभावित कर सकते हैं? क्या परिस्थिति-जन्य ऐसे विवाद जो विचारों की गवेषणा हेतु बौद्धिक स्तर पर ही सीमित हैं, आपके कार्य की दिशा का विलोपन  कर सकते हैं?  क्या किसी विशेष विषय पर विचारों का वह आदान-प्रदान जो काल-खंड में स्वतः सन्दर्भ-वंचित हो कर पतित हो जायेगा, आपके जीवन के मंतव्य में स्थायी परिवर्तन ला देगा? क्या लोकतान्त्रिक परम्पराओं के आधीन हमारी इस आधुनिक युग-व्यवस्था में, हमारी सनातन शाश्त्रार्थ की भावना इतनी क्षीण हो गयी हैं कि व्यक्ति में सहनशीलता अपने निम्न स्तर पर है?  क्या विपरीत विचारों के प्रति हमारी सहिष्णुता खंडित हो चुकी है?
 
यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा यदि हम अपने निर्णयों को विचार-विश्लेषण पर आधारित न कर व्यक्ति-विश्लेषण पर केन्द्रित करेंगे I नीति कहती है कि विचारवान ही निर्णय ले सकते हैं। अर्थात यह निर्णय-प्रक्रिया विचार-प्रणाली की उपज होनी चहिये। यहीं इस प्रक्रिया का मूल उपस्थित है. विचार जटिल भी हो सकते हैं एवं सरल भी।
 
परन्तु विचार उत्पन्न कैसे होते हैं? व्यक्ति ही विचारों का जनक है। अतः समता या विषमता व्यक्ति में ही विद्द्यमान है। व्यक्ति ने ही स्वयं को जटिलता अथवा सरलता से जोड़ रखा है और वही उसके निर्णय का आधार बनता है। सारगर्भित तथ्य यह है कि निर्णय की इस प्रक्रिया के उपरांत व्यक्ति अपनी जटिलता को और सहेजता है तथा अपने निर्णयों को परिस्थियों एवं घटना-विशेष पर आरोपित कर देता है। वर्तमान युग के मानव स्वभाव का यह एक विलक्षण बिंदु है। वह सरलता को नहीं सहेजता। वह जटिलता को आत्मसात करता है एवं क्लांत होता है। 
 
स्व-केन्द्रण व्यक्ति के व्यवहारगत आयामों में निरंतर जटिलता रोपित करता चलता है और इससे प्रभावित हो कर वह समाज से अपने प्रति मात्र प्रशष्ति की अपेक्षा रखता है। वैचारिक भिन्नता उसकी ऐसी किसी भी आकांक्षा पर कुठाराघात करती है और उसकी तार्किक शक्ति को बलहीन करती है। अतार्किक निर्णय सदैव विशमताजनक होते हैं और ये एक अंत का आरम्भ दर्शाते हैं।

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

स्तम्भ

समय की गति जीवन के अल्प काल में ही मनुष्य को उसकी उपादेयता के विभिन्न आयामों से परिचित करा देती है। अपने पाँच कमरों के मकान के एकांत में, दालान की आराम कुर्सी पर बैठे राम शंकर बाबू जाड़े की दोपहर की जाती हुयी धूप को सेंकते हुए यही विचार कर रहे थे।

"आप एक ठूंठ से अधिक और कुछ भी नहीं हैं"। उनके अपने बच्चे ही इस दीपावली पर ऐसा ही न जाने क्या-क्या कह कर चले गए थे। यद्यपि उन्होंने इसे एक अनर्गल प्रलाप से अधिक महत्त्व नहीं दिया तथापि, उन्होंने अपनी जीवन यात्रा की प्रासंगिकता पर एक दृष्टि अवश्य डाली।

उनके माँ और बाबू जी ने सदा उन्हें एक नन्हा पौधा समझ कर जीवन की बगिया में पल्लवित किया। उनके छोटे भाई-बहनों ने इस बढ़ते हुए पौधे को अपना सुरक्षा कवच माना। अपनी तरुणाई में यह तरु अपने मित्रों व सहपाठियों को सहायता के अनन्य कुसुम बिखराता था। उनकी जीवन-संगिनी ने उन्हें सदैव एक विशाल वृक्ष के रूप में देखा, जिसने सभी को यथाशक्ति दीर्घावधि तक अपनी मृदुल छाया का स्पर्श दिया। नये समय के रंग में रंगी नयी पीढ़ी ने जीवन के इस मोड़ पर यकायक उन्हें ठूंठ की संज्ञा दे डाली।

अपनी उपादेयता के इन्हीं अध्यायों का ध्यान कर वे मन ही मन मुस्कुरा दिए। उन्होंने तो बस एक स्तम्भ की भांति दृढ़ रह कर जीवन की जीवन की धूप-छांव में अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन किया। यह स्तम्भ कब पौधा था, कब वृक्ष बना और कब ठूंठ में परिवर्तित हो गया, इस यात्रा के विषय में उन्होंने कभी सोचा ही न था। जीवन की कितनी ही विषमतायें इस स्तम्भ से टकरा कर वापस लौट गयीं, दुश्वारियों के अनेक अंधड़ भी इसके आधार को हिला न सके, कष्टों का ताप इसे तनिक भी विगलित न कर सका और न ही जीवन के संघर्ष इस स्तम्भ पर खरोंच डाल सके। क्या ठूंठ ऐसा होता है?

छियत्तर की इस वय में विचारों की इसी उधेड़बुन की दुशाला डाले वे संध्या भ्रमण के लिए निकल पड़े।