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बुधवार, 4 नवंबर 2015

.... जी चाहता है

आज सब हार जाने को जी चाहता है।
गुल नहीं खार पाने को जी चाहता है।

सब तरफ बिखरा दूँ जो भी है संवरा हुआ,
समंदर  का ज्वार होने को जी चाहता है।

जबसे  संभाले  हैं  पाँव  बहते  जा  रहे हैं,
दरिया नहीं कनार होने को जी चाहता है।

मुझे  ले  चले  और गुमराह  कर  दे  कहीं,
सुलेमानी कालीन उड़ाने को जी चाहता है।

चुप रहने की आदत मैंने भी डाल ली अब,
लफ़्ज़ों  के  पार  रहने  को  जी  चाहता है।

जो सुलगता हो एहसासों का धुआं जिगर में,
सरापा  इक तूफ़ान उठाने को जी चाहता है।

अब सन्नाटे से कर ली हैं मोहब्बत मैंने,
तेरी आवाज़ भूल जाने को जी चाहता है।

तूने रुख मिलाया तो आँखें चौंधियाती रहीं,
मेरा अब पलकें खोलने  को  जी चाहता है।

शुकराना पढता हूँ कि तलब ख़त्म कर दी तूने,
इक सीधी सी ज़िन्दगी जीने को जी चाहता है।
   

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

सोलमेट !


अरी दईया  देखो ये ढूंढ रहे हैं अपना  सोलमेट !

पुराना जो   प्रेमी   है  वो  तो  है बस  एक  फ्रेंड। 

चला    नया    देखो   यह    कैसा  अजब   ट्रेंड। 
अबकी   बारी  लगता  है  ये  सबको  लेंगे लपेट।  
इसलिये  खुल कर  सभी  से कर रहे हैं गल-भेट। 
अरी  दईया देखो ये  ढूंढ रहे हैं अपना सोलमेट !

शादी और  डेटिंग  की  हर  साइट की कर ली रेकी। 
व्हाट्सएप्प  और फेसबुक  पर पाती भी ढेरों लेखी। 
इश्तिहारों  से चाँप  रखा है इन्होने पूरा  इन्टरनेट।   
और खोल दिये  हैं  भैया  दिल में आने के सारे गेट।  
अरी  दईया  देखो  ये  ढूंढ  रहे  हैं अपना  सोलमेट !

कम्बोडिया  का   हो  या  कि  कोई   म्यांमार का।  
बंगाल  का  छैला  हो, या  हो  रसिया  बिहार का। 
इतावली,   इज़रायली,  इस्ताम्बूली  भी  चलेगा।
मूड  में हैं अपने  और कुछ लगते  भी हैं डेस्पीरेट।     
रामा  हो  रामा,  ये   ढूंढ  रहे  हैं अपना  सोलमेट!

होली   का   रंग   है,  अपना   अड़बैंगा   ढंग  है।  
हॉर्लिक्स   की   जगह   आज   दूध   में भंग  है।  
बिगुल   में   मारो   फूँक   तो  बजता   मृदंग है।  
बस   करो   भइया   और   न  करो  मटियामेट।  
चलो  तुम  हमई  का बना  लो अपना सोलमेट !

खिलाइये  गुझिया,  नमकपारा,  पापड़   हमको  भरपेट। 

कांजी का बड़ा तो परोसिये, भरिये हमारा वाला भी प्लेट।   
आपही  के संग, खेले  हैं सब रंग; आ गये हम सब समेट।   
अपर  ही  रह  जायेगा  और   पूरा  सोल  देंगे  हम  चहेट। 
ज़रा कुछ  दिन  तो बनाइये  हमको अपने सोल का मेट !

फ्रेंड आ  गये   हैं  देखिये, इनको  मत  मार्क  करिये  लेट।
इंडियन टाइम  वाले  हैँ,  ज़रा कर लीजिये आप थोड़ा वेट।     
त्वम  शरणम्  गच्छामी , यह   दिया  है  लेटेस्ट  अपडेट।   
संभलिए, देखिये गड़बड़ा ना जाये कहीं आपका एस्टीमेट।  
लेडीज़ एंड जेंटलमेन! हेल्पिये फाइंडने में इनको सोलमेट !

अरी   दईया   देखो   ये  ढूंढ   रहे  हैं  अपना  सोलमेट !

शुक्रवार, 30 मई 2014

..... छोड़ दो

सुबह शाम के  अलाप छोड़ दो,
गुरियों  पर  वो   जाप छोड़ दो,
चिंता  भरे  हुये   इस  मन  से,
जीवन  के  संताप   छोड़   दो।

 
रहो या कि तुम  साथ  छोड़ दो,
हज़ारों क्या तुम लाख छोड़ दो,
मानूंगा  तुमको  मैं साथी  तब,
मुठ्ठी  भर  जब  खाक़  छोड़ दो।


सीधी  बात   कहो  'अर्थात' छोड़ दो,
सारे    उनके     निहितार्थ  छोड़ दो,
जो   मन   में   प्रीत   बसायी   तूने,
फिर समझो भाव, भावार्थ छोड़ दो।


जो  पीड़ा   दे  वह  प्यार  छोड़ दो,
अभिलाषा  वाले  व्यापार छोड़ दो,
उस  ओर   धरा  है,   हरियाली  है,
और मुझको तुम  मँझधार छोड़ दो

अंधड़  से  नौका  के   विलाप  छोड़ दो,
राग-द्धेष  की ऐनक  वाले पाप छोड़ दो,
आने  वाली  सदियों  के पल रहें मुखर,
पद्चिन्हों  की  तुम  वह छाप छोड़ दो।    
  
कहते  हो  तुम  प्रीत  छोड़ दो,
बढ़   जाओ  मनमीत छोड़ दो,
जीवन    मेरा   प्रेम - धुनी   है,
मत बोलो  कि संगीत छोड़ दो। 


अधरों  से  अधरों  का  आधार  छोड़ दो,
फिर नयनों में असुवन की धार छोड़ दो,
मत फहराओ स्वागत की ध्वज पताका,
बस  तुम  खुले  ह्रदय  के  द्धार  छोड़ दो। 


संदेसा चातक को कि आशा छोड़ दो,
पथरायी  अंखियों  की भाषा छोड़ दो,
छोर काल  के  पल  में  नप  जाते  हैं,
रे उत्साही,  सबरी  निराशा  छोड़ दो।    

  

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

एक तारा

तेज़  रफ़्तार ज़िन्दगी  ऐसे  हौले  से  मोड़ती है।  
कभी सरापा लबरेज़, कभी खूं तक निचोड़ती है। 

हयात   उतरती   है   किसी  के   सीने  में   जब,
रगों  में  खून    नहीं एक  उम्मीद    दौड़ती   है। 

गेसुओं   को   अपने   चेहरे   पर   ले   आती  है,
शर्मा कर  जब  वो  खुद  अपनी  लट  ओढ़ती है।

तुम्हारी   यादें   क्या - क्या   कर   गुजरती   हैं,
दिल  थामती  हैं  तो  कभी  सांसों  से जोड़ती हैं।

वो   कहते  हैं  कि  ये  सब  शायराना  शगल  हैं,
सच  कहा,  बेख़ुदी 
हकीक़त में कब   छोड़ती है।
मैं  सजा  लेता  हूँ  गुलदस्ते  तुम्हारी  यादों  के,
फुरकत   की   आबोहवा   मेरा  दम  तोड़ती  है। 

हाशिया,   मेरे   आराम  की   बेहतर  जगह   है,
फलक   की  गहमागहमी   मुझे   सिकोड़ती है। 

तुमसे   कोई   शिकवा    नहीं   है         मुझको,
तुम्हे  छू   के  आयी  हवा  बहोत  झिंझोड़ती है।

मेरी मुठ्ठी में है टूटा हुआ तेरी पलक का एक बाल,
मुन्तज़र हूँ कि कब कहकशां कोई तारा तोड़ती है।  

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

ऐसा नहीं

कोई  मुझको  चाह  ले ऐसा नहीं।
मेरे  ग़म  की  थाह  ले ऐसा नहीं।
 
मुश्किलात  हासिल हैं  हर वक़्त,
दिल  थोड़ा  कराह  ले ऐसा नहीं।

मैं उसको चाहता हूँ दिलोजान से,
मुझको भी वो चाह ले ऐसा नहीं।

इंकलाब के ख़यालात मुझमें भी हैं,
हुक़ूमत मुझसे सलाह ले ऐसा नहीं।

सिधाई  अभी  भी  बची  है काफ़ी,
सिर्फ़  टेड़ी  ही  राह  ले ऐसा नहीं।

मेरी आँखों में गहरायी नहीं शायद,
वो मेरे दिल की  थाह ले ऐसा नहीं।

छोड़  दिया  अब  आदमी के भरोसे,
ख़ुदा हिसाब-ए-ग़ुनाह ले ऐसा नहीं।

दिक्कतें   मेरे  साथ   भी   हैं   कई,
सब  मुझसे   निबाह  ले ऐसा नहीं।

शामियाने ज़िन्दगी के उखड़ गए,
अब  कोई   पनाह  ले  ऐसा  नहीं।

मैं  भी  कुछ अपनी पसंद रखता हूँ,
जो चाहे मिला निग़ाह ले ऐसा नहीं।
 

रविवार, 10 नवंबर 2013

वन्दिता

क्षीर  नीर  से  ले   कर  ज्यों  कोई   हंस  हो  पीता,
ऐसे सम्बल ले कर तुमसे मैं जीवन अपना जीता।

क्यूँ न कहूँ सागरिका तुमको, मिलें जहाँ गुण-सरिता,

पतझर  में  सावन  ला  दो,  हे  स्नेह-स्वरूपा वनिता।

जीवन के क्षण युग से लगे, ऐसा  भी एक काल है बीता,

वह  पल  भी  है  मैंने  भोगा  जब स्वयं ही से  मैं भीता।

बरसाया अनुराग बहुत सा, बन कर मेरी अनुप्रीता,

मैं  ही  संचय  कर ना पाया, हृदयकोश  चिर  रीता।

रहा नहीं मधुमास ,हाय! विलग हुयी मुझसे मेरी मधुमीता,

अहो!  क्या  कर  सके  राम भी,चली  गयीं  थी जब  सीता ?

तिस पर भी  उर से  लगा रखे मस्तक पर बन रज -शोभिता,
प्रेम-गुच्छ  का  अर्पण  फीका, प्रिये! तुम  हो  मेरी  वन्दिता।


शनिवार, 27 नवंबर 2010

गम

उठने दो गम और उमड़ने दो आंसू,
आये हैं मेहमां मैं पलकें बिछा लूं।
दिखता नहीं कुछ ये कैसा असर है,
आँखों के भीतर नज़र ही नज़र है।
देखूं जिसे वो नज़ारा नहीं है,
दिखता है जो वो हमारा नहीं है।

ढूँढो ऐ नज़रों उन्हें पास लाओ,
हालत पे मेरी ना तुम मुस्कराओ।
उठने दो गम और उमड़ने दो आंसू,
आये हैं मेहमां मैं पलकें बिछा लूं।

रविवार, 20 जून 2010

नज़र

नज़रों को कोई वहम नहीं,
हमें तुमसे कोई गम नहीं।
मिटने दो आरजुओं को,
वफ़ा नहीं, कसम नहीं।

तुम्हारा मुझ पर करम नहीं,
याद मुझे कोई सितम नहीं।
हम ही हार जाते हैं लो,
आज किसी पर जुलम नहीं।

अब रास्तों का भरम नहीं,
मंज़िल हमारी तुम नहीं।
किन आंसुओं से रोवोगे,
दीन नहीं, धरम नहीं।

वादे वो अब कायम नहीं,
इसका कोई मातम नहीं।
हम ही बहक गए थे दोस्त,
गलत तुम्हारे कदम नहीं।

सफ़र-ऐ-ज़िन्दगी अभी ख़त्म नहीं,
तमन्ना जीने की भी कम नहीं।
तमाम नमी अभी आँखों में हैं,
पीने को ख़त्म शबनम नहीं।

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

एक पल सोच लो...

किसी के आने का,
किसी के जाने का,
नहीं कुछ ग़म हमें,
बीते अफ़साने का।
ज़रा सी तमन्ना पर
यूँ बिगड़ जाना भी क्या?
गुनाह कुछ मेरा नहीं,
कुसूर मौसम मस्ताने का।
एक पल सोच लो हमसे जुदा होने से पहले।

कुछ कमाल निगाह का,
कुछ उस ठंडी आह का।
याद अब तलक मुझे,
अंजाम उस कराह का।
डूबना तो आसां है, मुश्किल
बहुत मगर निकलना।
ग़ुम होने के बाद पता
चलता नहीं है राह का।
एक पल सोच लो रिश्ते अदा करने से पहले।

ये प्याला परवाने का,
नाम हो दीवाने का,
चूमती शमा यहाँ,
पानी हर पैमाने का।
छलकता जाम यहाँ,
बिखरती बहार यहाँ,
मिलेगा तुझे कहाँ,
रंग ये मयखाने का?
एल पल सोच लो अलविदा कहने से पहले।