रविवार, 29 अगस्त 2010

नींद

नींद मुझे कब आती है?

नयनों से दूर है उसका वास,
किंचित नहीं स्वप्निल आभास,
बस एक अकेला मन मेरा,
एक स्मृति जिसमे भरमाती है।

नींद मुझे कब आती है?

मैं दिन भर चलता-फिरता हूँ,
हर क्षण में सौ पल गिनता हूँ,
किन्तु समय कि रेखा तो,
बस दूरी ही और बढाती है।

नींद मुझे कब आती है?

हर सहर मैं जाता नयी डगर,
आशाओं की झोली भर-भर,
फिर लम्बी हो जाती परछाई,
दिन ढलता रात आ जाती है।

नींद मुझे कब आती है?

इस बार करूंगा फिर प्रयास,
सपने बुन लूँगा आस-पास,
अँधियारा तो छाया है,
पर दृष्टि दूर तक जाती है।

नींद मुझे कब आती है?

सुख की घड़ियाँ, दुःख का त्रास,
नहीं तुषार, पर ज्वलंत प्यास,
नीर चक्षु से निकले तो भी,
अब आग कहाँ बुझ पाती है।

नींद मुझे कब आती है?

9 टिप्‍पणियां:

  1. सुख की घड़ियाँ, दुःख का त्रास,
    नहीं तुषार, पर ज्वलंत प्यास,
    नीर चक्षु से निकले तो भी,
    अब आग कहाँ बुझ पाती है।

    बहुत भावपूर्ण रचना ...अच्छी प्रस्तुति

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  2. संगीता जी , आपको बहुत बहुत धन्यवाद्. बस ऐसे ही मनोबल को बढ़ाते रहिये.

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  3. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 5-10 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  4. संगीता जी, आपका अत्यंत धन्यवाद्. कृपया मुझे बताएं की मुझे क्या करना होगा? मैं अगले दो दिनों तक नेट पैर आ न सकूंगा. मुझसे क्या अपेक्षा है इस मंच हेतु वह बताएं.

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  5. सत्येन जी ,
    इस मंच पर आप आ कर देखिये ..आप बहुत लोगों के लिंक्स पायेंगे ...इस मंच का उद्देश्य है कि जिन रचनाकारों तक लोंग नहीं पहुँच पाते उन तक लिंक दे कर लगों को पहुँचाया जा सके ..और अच्छी रचनाओं कि जानकारी दी जा सके ...आपको जब भी वक्त मिले आप नीचे दिए लिंक पर एक बार अवश्य देखें...और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएँ ..

    http://charchamanch.blogspot.com/2010/10/19-297.html

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  6. इस बार करूंगा फिर प्रयास,
    सपने बुन लूँगा आस-पास,
    अँधियारा तो छाया है,
    पर दृष्टि दूर तक जाती है।

    apko pahli baar padha bahut acchhi rachna.

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