शनिवार, 7 जनवरी 2012

रिश्तेदारी?

ये कैसी रिश्तेदारी?


न दुःख में न सुख में,
योग में न वियोग में,
तेरी तनिक भी भागीदारी?
ये कैसी रिश्तेदारी?


जैसे धरती और व्योम,
सारा जीवन है विलोम,
जैसे क्षितिज मिथ्याधारी।
ये कैसी रिश्तेदारी?


आग पर घी छींटे,
पानी पे लाठी पीटे,
सब बने इच्छाचारी।
ये कैसी रिश्तेदारी?


टूट गये सारे सेतु,
ज्वार-भाटा, राहू-केतु,
मंझधार में नाव डारी।
ये कैसी रिश्तेदारी?


काल की महादशा,
सर्प सा इसने डसा,
प्रारब्ध सब पे भारी।
ये कैसी रिश्तेदारी?


बंद सारे द्वार हैं,
न खुलने के आसार हैं,
फिर क्यूँ सम्बंध ज़ारी?
ये कैसी रिश्तेदारी?

न सुर - न ताल,
विक्रम - वेताल,
इस जोड़ी पे बलिहारी।
ये कैसी रिश्तेदारी?


अंधियारे में, कुहासे से,
जीवन के पासे से,
जीती बाज़ी हारी !
ये कैसी रिश्तेदारी? 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपके पोस्ट पर प्रथम बार आया हूं । बहुत सुंदर प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट " हो जाते हैं क्यूं आद्रर् नयन पर ": पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद। .

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  2. आपका बहुत बहुत धन्यवाद प्रेम सरोवर जी एवम सविता जी।

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