गुरुवार, 7 जनवरी 2010

एक पल सोच लो...

किसी के आने का,
किसी के जाने का,
नहीं कुछ ग़म हमें,
बीते अफ़साने का।
ज़रा सी तमन्ना पर
यूँ बिगड़ जाना भी क्या?
गुनाह कुछ मेरा नहीं,
कुसूर मौसम मस्ताने का।
एक पल सोच लो हमसे जुदा होने से पहले।

कुछ कमाल निगाह का,
कुछ उस ठंडी आह का।
याद अब तलक मुझे,
अंजाम उस कराह का।
डूबना तो आसां है, मुश्किल
बहुत मगर निकलना।
ग़ुम होने के बाद पता
चलता नहीं है राह का।
एक पल सोच लो रिश्ते अदा करने से पहले।

ये प्याला परवाने का,
नाम हो दीवाने का,
चूमती शमा यहाँ,
पानी हर पैमाने का।
छलकता जाम यहाँ,
बिखरती बहार यहाँ,
मिलेगा तुझे कहाँ,
रंग ये मयखाने का?
एल पल सोच लो अलविदा कहने से पहले।

2 टिप्‍पणियां:

  1. ज़रा सी तमन्ना पर
    यूँ बिगड़ जाना भी क्या?
    गुनाह कुछ मेरा नहीं,
    कुसूर मौसम मस्ताने का।
    वाह हर पँक्ति दिल को छू गयी। बहुत सुन्दर गीत है बधाई। सत्येन जी लखनू से मेरा शायद कुछ पिछले जन्म का सम्बन्ध है मुझे प्रेरणा देने वाले और राह दिखाने वाले बहुत अच्छे लोग मिले हैं मुझे जिन मे डा चक्रधर .नलिन जी मेरे बडे भाई जैसे { बाल लेखक} और प्रकाश गोविन्द जी ब्लागर मेरे बेटे जैसे। आपका मेरे ब्लाग पर आने के लिये धन्यवाद पहली बार शायद देखा है ब्लाग । बहुत अच्छा लगा । वैसे आपको बता दूँ नेट के बारे मे अधिक नहीं जानती बस पोस्टिन्ग और ब्लोग्स पढने आते हैं अभी तक । अपको बहुत बहुत शुभकामनायें

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  2. Hi
    Actually it seems that your template doesnot have the code or top menu
    You can easily add this code
    search for - #navbar-iframe { display:block }

    It will be in the begining of the code.....
    after that add 3-4 lines of code
    like this--
    #navbar-iframe { display:block }

    #navbar-iframe {
    visibility: visible;
    }

    Hope this will work for you...

    You can delete this comment once you got your problem solved..

    उत्तर देंहटाएं